मेरा जन्म: 02/07/1998 बिहार मधुबनी जिला के एक छोटा सा गांव वार्ड नंबर 10 बलथारवा मे हुआ है मै एक गरीब परिवार से हूं जब मैं 4 या 5 साल के था लग भग रहा हूं गा मैं सब के पास दादा और दादी था, थी लेकिन मेरे पास नाना और नहीं था, थी जब दूसरों को देखता था तो मेरा दिल दहेल जाता है सुन कर और मैं सोचता था मेरे भी दादा और दादी मेरे पास होता तो मैं भी कहता लेकिन ऐसा नहीं हो सकता था क्यू की मेरी माँ मैके में रहती थी बास और मिट्टी के बनाया 4x4 के घर में रहती जो कि मेरा नाना जी ने दिया था रहने को मेरी माँ को तभी मैं 4 भाई था मेरा अब्बा कमाने गए थे 1918 किलोमीटर दूर भिवंडी महाराष्ट्रा में पॉवर लूम चला के प्रती माहा ₹1500 कमाते थे इस में से रूम भाड़ा होटल शौचालय बिल काट कर ₹1000 भेजा करते थे लेकिन फिर कम पर्तें थे घर चलाने में गरीब के कारण मेरा बड़े भाई सरकारी स्कूल
सरकारी स्कूल में 5 क्लास तक करने के बाद मेरा भाई मेरे घर के हालात खराब होने की वजह से भैंस चराने लगा उसके बाद वहां से भी राशन पानी चालू हो गया थोड़ा बहुत घर से सुधार हुआ लेकिन फिर भी परिवार बढ़ता गया मुसीबत भी बढ़ती गई उसके इस साल के बाद मेरा नाना जी जहां पर पुराने वाले घर था उसे जगह पर हवा करके ऐसी जगह पर मुझे जमीन दिया घर बांधने के लिए कुछ सालों के लिए वह जगह बाद में था बाद बोले तो सड़क से दो-तीन मिनट लगता था मेरे घर पर जाने के लिए मेरे घर पर साइकिल नहीं जा सकता था मोटरसाइकिल नहीं जा सकता था गाड़ी नहीं जा सकता था क्योंकि वह रास्ता इतना पतला था वह खेती का रास्ता था अब यहीं से मेरा सिलसिला चालू होता है 2009 में मुझे एक ऐसा बीमारी हुआ नहीं तो मैं चल पाता था नहीं तो मैं ऊपर बैठ जाता था कहीं भी मैं जा नहीं सकता था केवल मैं बिस्तर पर सोया रहता था इलाज करने का पैसा नहीं था मेरी मां बोली मेरे बाप को ऐसे ऐसे बात हुआ है मेरा पापा बोल मर जाने दो है 6 बेटे में से एक मर भी जाएगा कोई फर्क नहीं करेगा मेरा नाना नानी मुझे दवाई करवाया मेरी मौसी से पर्दा उठा करके नजदीक ही डॉक्टर में जा करके मुझे चेक कर आया और बताया कि शरीर में खून नहीं है मेरा नाना नानी हार नहीं है उसके बाद मेरा नाना नानी दवा कराया उसके बाद मैं धीरे-धीरे चलने लगा उठने लगा बैठने लगा आप फिर से मुझे नई जिंदगी मिली 2011 में सरकारी स्कूल में माय नाम दिखाए साथ ही प्राइवेट स्कूल में भी दोनों में मैं कोलकाता पढ़ता था सबसे ज्यादा प्राइवेट स्कूल में उसके बाद फिर मदरसा में नाम लिखिया वहां पर कुरान शरीफ भी पढ़ने लगा सात पाड़ा तक पढ़ा था गांव वाले में आनाकानी हो करके मदरसा बंद करना पड़ा उसके बाद 2013 में एक लड़की की गलतफहमी की वजह से मुझे प्राइवेट स्कूल से निकाल दिया गया फिर मैं अपने गांव से दूसरे गांव में मदरसा में नाम दिखाएं वहां पर मारूफ पढ़ाया जाता था कुरान शरीफ उमर थोड़ा लंबा होने के कारण मैं पढ़ नहीं पाया उसके बाद वहां पर भी नहीं छोड़ दिया रमजान के समय में फिर मैं अपने मौसी के गांव गया वहां पर भी मैं मदरसा में नाम दिखाया और 18 पाड़ा तक कुरान शरीफ पढ़ रहा हूं?
पिछली बातें जब मैं पढ़ रहा था उसे समय की बात है मैं छोटा सा था अगर मैं कहीं भी घूमने जाता था ना मेरा अब्बा मुझे बहुत मारता था कभी खाना खाने के लिए कभी काम में भूल जाता था क्या काम दिया था बहुत मारा करता था मरता था चोट लगता था लेकिन आंख से आंसू बहता था मैं रोता भी नहीं था बहुत ही तकलीफ होता था पहले की बात है शरीर पर एक गंजी पहना था जिसे इंग्लिश में अंडरवियर बोलते हैं वह भी जाली वाला और एक हाफ पेंट इस समय इतना कपड़े पर तकलीफ था कि दूसरों के लिए लेकर चलते थे
अब कि बात 2014 /27/ दिसंबर
मेरा अब्बू जहां पर काम करता था भिवंडी जी महाराष्ट्र में मैं भी पहली बार कदम रखा हूं मैं काम भी मिशन चलाया सभी तरह का महीने का ₹14000 पगार उठता था
फिर मेरा शादी हुआ 2018 में
फिर मैं वापस से भिवंडी महाराष्ट्र आता हूं पावर लूम चलाने के लिए एकदम सही चल रहा था की फिर मुझे 2019 में एक लड़का हुआ और मुसीबत भी आया मुसीबत यह आया है मेरे दोनों किडनी में स्टोन हो गया 3 एमएम का फिर मैं 2020 में घर जाता हूं कभी लॉकडाउन लग जाता है फिर मैं नेपाल जाता हूं पर्दा उठा करके वहां पर एक मौलाना खान बिना कोई टेक्नोलॉजी को बताता था शरीर में क्या कष्ट और परेशानी है सिर्फ करने के बाद मुझे दवा दिया स्टोन डालने पर दवा खाया दोनों नुकसान फिर गिर गया ऐसा ही सिलसिला लगातार 2025 तक चला बहुत कर्ज में डूब गया?
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