गरीब आयशा की ईद
बिहार के एक छोटे से गाँव में आयशा नाम की एक गरीब लड़की रहती थी। उसका बचपन बहुत मुश्किलों में बीता था। उसके पिता कई साल पहले बीमारी से गुजर गए थे और अब उसकी माँ लोगों के घरों में काम करके किसी तरह घर चलाती थी।
रमज़ान का महीना शुरू हो चुका था। पूरा गाँव रोज़ा रख रहा था और मस्जिदों में नमाज़ पढ़ी जा रही थी। हर घर में इफ्तार की तैयारी होती थी, लेकिन आयशा के घर में अक्सर केवल पानी और सूखी रोटी ही होती थी।
एक दिन इफ्तार के समय आयशा ने अपनी माँ से पूछा “अम्मी, क्या इस बार ईद पर मुझे नया कपड़ा मिलेगा?”
माँ कुछ पल चुप रही। उसकी आँखों में आँसू आ गए। वह बोली “बेटी, अगर अल्लाह ने चाहा तो जरूर मिलेगा।”
लेकिन आयशा समझ गई थी कि घर की हालत कैसी है। उसने मुस्कुराकर कहा “अम्मी, मुझे नया कपड़ा नहीं चाहिए, बस आप खुश रहो।”
ईद का दिन आ गया। गाँव के बच्चे नए कपड़े पहनकर खुश थे, लेकिन आयशा ने वही पुराना कपड़ा पहन लिया। फिर भी उसके चेहरे पर मुस्कान थी।
नमाज़ के बाद जब लोग एक-दूसरे को गले लगा रहे थे, तभी गाँव के एक बुजुर्ग ने आयशा को बुलाया। उन्होंने उसे एक सुंदर कपड़ा और मिठाई दी।
आयशा की आँखों से आँसू निकल पड़े। उसने आसमान की तरफ देखकर धीरे से कहा “शुक्र है अल्लाह, आपने मेरी अम्मी की इज्जत रख ली।”
उस दिन आयशा को समझ आ गया कि ईद की असली खुशी नए कपड़ों में नहीं, बल्कि दुआ और मोहब्बत में होती है।
गाँव के लोग आज भी कहते हैं कभी किसी गरीब की खुशी मत छीनो, क्योंकि उसकी छोटी सी मुस्कान सबसे बड़ी दुआ होती है।