साजिद की ईद: जब 8 लूम मचिनो के शोर में खुशियां कहीं खो गयी...
तारीख याद नहीं थी, बस 'ईद' का इंतज़ार था। साजिद ने हफ़्तों पहले से हिसाब लगाना शुरू कर दिया था। आठ लूम मशीनों के शोर के बीच, 12-12 घंटे की रात की शिफ्ट काटते हुए उसने सिर्फ एक ही सपना देखा था—कि इस बार जब ईद का चाँद दिखेगा, तो उसकी नन्ही बेटी परी की तरह चहकेगी और घर का हर सदस्य नए कपड़ों की खुशबू से महकेगा।
ईद की सुबह हुई। साजिद ने अपनी पत्नी और बच्चों को नए कपड़ों में तैयार किया। उनकी चमकती आँखों और खिलखिलाहट ने एक पल के लिए साजिद के सीने के उस बोझ को हल्का कर दिया, जो कर्ज़ और ज़िम्मेदारियों की वजह से पत्थर जैसा भारी हो गया था।
पर जब खुद की बारी आई, तो अलमारी के एक कोने में वही पुराना सफेद कुर्ता टँगा मिला। साजिद ने उसे हाथ में लिया, उसकी सिलाई अब कमजोर पड़ चुकी थी, ठीक वैसी ही जैसे उसकी जेब। उसने आईने में खुद को देखा—चेहरे पर रात की शिफ्टों की थकान थी और मन में ये सवाल कि **"क्या इस बार मेरे हिस्से की खुशी बस दूसरों को खुश देखने में ही लिखी है?"**
नमाज़ का वक्त हुआ। साजिद ईदगाह पहुँचा। चारों तरफ नए कपड़ों की चमक थी, इत्र की महक थी। लोग गले मिल रहे थे, उनके नए कुर्ते सूरज की रोशनी में चमक रहे थे। साजिद एक कोने में खड़ा हो गया। उसने अपनी निगाहें नीचे कीं, तो अपने पुराने कुर्ते की एक सिलवट पर नज़र पड़ी।
उस पल साजिद का दिल सहम गया। उसकी आँखों के कोर गीले होने लगे। उसने आसमान की तरफ देखा और ज़ुबान खामोश रही, पर रूह चिल्ला उठी—**"ऐ मालिक, कैसा ये इम्तिहान है? अपनों की हसरत पूरी करने के लिए खुद की ज़ात को मारना पड़ता है। एक नया कपड़ा लेने से पहले भी हजार बार कर्ज़ और रोटी का हिसाब करना पड़ता है।"**
भीड़ में जहाँ सब मुस्कुरा रहे थे, साजिद की आँखों से एक कतरा आँसू चुपके से ज़मीन पर गिर गया। वो दर्द भरी निगाहें किसी ने नहीं देखीं, सिवाय उस खुदा के।
पर जब वो घर लौटा और उसकी बेटी ने दौड़कर उसे गले लगाया, तो साजिद ने मुस्कुराने की कोशिश की। उसने अपने आँसू पोंछ लिए। उसे एहसास हुआ कि भले ही उसका कुर्ता पुराना था, लेकिन उसकी नीयत और अपनों के लिए उसकी कुर्बानी सबसे कीमती लिबास थी।
यह मेरी असली कहानी है, जो दिल से जुड़ी हुई है। लेकिन जो फोटो आप देख रहे हैं, वह केवल एक सैंपल है, असली घटना की झलक दिखाने के लिए।