कलेक्टर बनने का सपना और बीच राह में धोखे का ज़हर: शंकर की अधूरी कहानी
वो एक गरीब साइकिल रिक्शा चलाने वाला था… नाम था — शंकर।
दिनभर पसीना बहाता… और रात को थककर सो जाता।
एक दिन उसकी माँ ने उसकी शादी कर दी।
“अब तेरी जिंदगी भी संभल जाएगी…” माँ ने कहा।
शादी के बाद… पहली रात…
उसकी पत्नी ने धीरे से कहा —
“मुझे कुछ कहना है…”
शंकर मुस्कुराया — “हाँ, बोलो…”
“मैं पढ़ना चाहती हूँ… मैं कलेक्टर बनना चाहती हूँ…”
शंकर कुछ पल के लिए चुप हो गया…
फिर मुस्कुराया —
“इससे अच्छी बात क्या हो सकती है… मैं तेरे साथ हूँ…”
उस रात…
वो खुद से बोला —
“मैं अनपढ़ सही… लेकिन मेरी बीवी कलेक्टर बनेगी…”
दिन बीतते गए…
शंकर रिक्शा चलाता… और उसकी पत्नी पढ़ाई करती।
“आज फीस भरनी है…” वो कहती।
शंकर बिना सोचे पैसे दे देता।
कभी खुद भूखा रह जाता…
लेकिन उसकी किताबें कभी खाली नहीं रहने देता।
समय बीता…
एक बच्चा हुआ…
कुछ समय के लिए पढ़ाई रुकी…
लेकिन शंकर ने फिर कहा —
“तू पढ़… बच्चा मैं संभाल लूँगा…”
उसकी आँखों में सिर्फ एक सपना था —
“मेरी पत्नी एक दिन बड़ी अफसर बनेगी…”
एक दिन…
वो पढ़ने गई…
लेकिन…
वापस नहीं आई।
पहले एक दिन… फिर दो दिन… फिर हफ्ता…
शंकर हर रास्ते पर उसे ढूंढता रहा…
“कहीं कुछ हो गया होगा…” वो खुद को समझाता रहा।
लेकिन…
एक महीने बाद…
सच्चाई सामने आई।
वो किसी और के साथ चली गई थी।
शंकर के हाथ से सब कुछ छूट गया…
सपना… भरोसा… और जिंदगी भी।
उस रात…
वो अपने बच्चे को सीने से लगाकर बैठा था…
आँखों से आँसू बह रहे थे…
लेकिन आवाज नहीं थी।
क्योंकि…
गरीब आदमी का दर्द…
कभी किसी को सुनाई नहीं देता।
अब सवाल ये है —
👉 क्या शंकर अपनी जिंदगी फिर से शुरू करेगा…?
👉 क्या वो अपने बच्चे को उसी प्यार से बड़ा करेगा… जिस प्यार से उसने अपनी पत्नी का सपना पूरा करना चाहा था…?
👉 या फिर…
उसका भरोसा इतना टूट चुका होगा कि अब वो किसी पर विश्वास ही नहीं करेगा…?
👉 और सबसे बड़ा सवाल…
👉 क्या सच में प्यार और त्याग की कोई कीमत नहीं होती… या फिर…
गरीब का सपना हमेशा अधूरा ही रह जाता है…?