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ममता के लिए संजय का बेपनाह :प्यार

Ayesha 26 Mar, 2026 68 Views
शादी का मंडप: बेबस ममता और गरीब संजय

बिहार के छोटे से गांव खगड़िया के एक पुराने कच्चे मकान में, बूढ़ी दादी अपनी पोती ममता के साथ रहती थी। ममता गांव की सबसे सुंदर लड़की थी, लेकिन उसके सपने इस छोटे से गांव से कहीं बड़े थे।

एक दोपहर दादी ने ऊंची आवाज़ में पुकारा, "अरे ओ ममता, कहां मर गई? सुध-बुध भी है कि बस ख्यालों में खोई रहेगी?"

ममता ने आंगन से दौड़ते हुए कहा, "हां दादी, आई! बस बाल संवार रही थी।"

दादी ने उसे गौर से देखा और बुदबुदाया, "यह लड़की भी न, जाने दिन भर शीशे में क्या-क्या करती रहती है। सुन, आज मंदिर में विशेष पूजा है, जल्दी से अपनी लाल साड़ी पहनकर तैयार हो जा।"

ममता ने मासूमियत से कहा, "ठीक है दादी, अभी तैयार होती हूं।" उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि आज उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा फैसला उसकी मर्जी के बिना होने वाला है।

जब ममता मंदिर पहुंची, तो वहां का नज़ारा देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वहां कोई साधारण पूजा नहीं, बल्कि उसकी शादी का मंडप सजा था। गांव के लोग जमा थे और सामने एक लड़का बैठा था।

दादी ने ममता का हाथ पकड़ा और कठोर लहजे में कहा, "जा बेटी, अपनी किस्मत के पास बैठ जा। दूल्हे के पास बैठ।"

ममता का गला रुंध गया। वह कैसे बताती कि उसका दिल किसी और के लिए धड़कता है? वह किसी और शहर के लड़के से प्यार करती थी। लेकिन दादी की इज़्ज़त और समाज के डर से वह चुपचाप पत्थर की मूरत बनी मंडप में बैठ गई। उसकी आँखों से गिरते आँसू उसकी लाल चुनरी में जज्ब हो रहे थे।

जिस लड़के से उसकी शादी हो रही थी, उसका नाम संजय था। संजय एक अनाथ और गरीब लड़का था, लेकिन पूरे गांव में अपनी ईमानदारी और मेहनत के लिए जाना जाता था। पंडित जी ने मंत्र पढ़े, फेरे हुए और भारी मन से ममता का कन्यादान कर दिया गया।

अस्पताल में जीवन-मौत के बीच ममता

संजय का कोई अपना परिवार नहीं था, इसलिए गांव वालों ने ही ढोल-नगाड़ों के साथ उसका गृह प्रवेश करवाया। रात ढली और सुहागरात का वक्त आया। संजय जैसे ही कमरे में दाखिल हुआ, ममता ने नफरत भरी नज़रों से उसे देखा।

ममता की आवाज़ में एक अजीब सी कर्कशता थी, "खबरदार जो मुझे छुआ भी! मैं तुमसे और तुम्हारी इस गरीबी से नफरत करती हूं। तुमने मेरी दादी के साथ मिलकर मुझे धोखे के जाल में फंसाया है। तुम जैसा मामूली इंसान मेरी बराबरी कभी नहीं कर सकता।"

संजय का चेहरा मायूस हो गया। उसने सफाई देने की कोशिश भी नहीं की। वह चुपचाप पलंग से अपना तकिया और पुरानी रजाई उठाई और ज़मीन पर एक फटी हुई दरी बिछाकर सो गया। उस रात से उनके बीच एक ऐसी दीवार खिंच गई जो कभी नहीं ढही।

महीने बीतते गए। ममता हर रोज़ संजय को ताने देती, उसे नीचा दिखाती और कभी-कभी तो उसके हाथ का दिया खाना भी फेंक देती। लेकिन संजय? वह सुबह चार बजे उठकर मजदूरी पर जाता, दिन भर कड़ी धूप में काम करता और शाम को जो भी कमाता, ममता की सुख-सुविधाओं पर खर्च कर देता। वह ममता को हमेशा एक उम्मीद भरी, प्यार भरी निगाहों से देखता, जैसे कह रहा हो—'एक दिन तुम मुझे समझोगी।'

किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। अचानक एक रात ममता को खून की उल्टियाँ होने लगीं। संजय उसे अपनी पीठ पर लादकर गांव के अस्पताल भागा। वहां से उसे शहर के बड़े अस्पताल रेफर कर दिया गया। डॉक्टरों ने बताया कि उसके फेफड़ों में गंभीर संक्रमण है। उसे वेंटिलेटर पर डाल दिया गया।

संजय ने अपनी ज़मीन का छोटा सा टुकड़ा बेच दिया, लोगों के आगे हाथ फैलाए ताकि ममता की सांसें चलती रहें। वह अस्पताल के बाहर सड़क पर सोता और दिन भर कांच की खिड़की से उसे निहारता रहता।

हफ़्तों बाद, एक सुबह ममता की आँखों में थोड़ी हलचल हुई। उसने धीरे से अपनी पलकें खोलीं। वेंटिलेटर की 'बीप-बीप' उसे डरा रही थी। उसने देखा कि संजय ठीक उसके बेड के पास एक स्टूल पर बैठा है। उसका चेहरा पहचान में नहीं आ रहा था—गाल पिचक गए थे, बाल बिखरे थे और उसकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे।

संजय की आँखों में आँसू थे। वह ममता का हाथ थामे हुए था, जैसे खुदा से उसकी ज़िंदगी की भीख मांग रहा हो। ममता को उस पल अपनी पूरी ज़िंदगी याद आ गई। उसे याद आया कि कैसे उसने इस फरिश्ते जैसे इंसान को हर पल तड़पाया था। उसने उसे ज़मीन पर सुलाया, उसे गाली दी, उसे ठुकराया। और आज वही इंसान अपनी जान की बाजी लगाकर उसे बचा रहा था।

ममता की आँखों से पश्चाताप के आँसू बहने लगे। वह हाथ हिलाकर उसे बताना चाहती थी कि "संजय, मुझे माफ़ कर दो, मैं गलत थी।" वह चिल्लाकर कहना चाहती थी कि "तुम दुनिया के सबसे अच्छे पति हो।" लेकिन वेंटिलेटर की पाइपों ने उसकी आवाज़ छीन ली थी।

संजय ने उसे रोते देखा तो उसके माथे को चूम लिया और रुआंसी आवाज़ में कहा, "चुप हो जाओ ममता, अब सब ठीक है। तुम घर चलो, मैं अब तुम्हें कभी परेशान नहीं करूँगा। तुम जो कहोगी वही होगा।"

ममता ने आखिरी बार ज़ोर लगाकर संजय के हाथ को पकड़ा। उसने आँखों ही आँखों में अपना सारा प्यार और माफ़ी संजय के नाम कर दी। अचानक मशीनों का शोर बढ़ गया। ईसीजी की स्क्रीन पर चलती लहरें एकदम सीधी लकीर में बदल गईं—'टीईईईई...'

ममता की मौत और संजय का विलाप

ममता का हाथ संजय की पकड़ से छूटकर बेड पर गिर गया। डॉक्टर दौड़े आए और उन्होंने ममता को मृत घोषित कर दिया। संजय वहीं घुटनों के बल बैठ गया और आसमान फाड़ देने वाली चीख मारी। ममता उसे अपनी गलती सुधारने का एक मौका दिए बिना ही इस दुनिया से विदा हो गई थी। खगड़िया के उस छोटे से घर में अब सिर्फ संजय की तन्हाई और ममता की यादें बची थीं।

लेखक: Ayesha
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