राखी का इंतज़ार… या दिल का इम्तिहान?
“भैया… इस बार रक्षाबंधन पर आना… बहुत साल हो गए…” फोन के उस पार से बहन की आवाज आई।
अमन कुछ पल चुप रहा…
“इस बार जरूर आऊँगा…” उसने धीरे से कहा।
अमन पिछले 6 साल से विदेश में था…
माँ-बाप गाँव में… और उसकी छोटी बहन रानी…
जिसके लिए वो सब कुछ करता था।
राखी नजदीक थी…
अमन ने बिना सोचे… महंगी फ्लाइट टिकट बुक कर ली।
ऑफिस में छुट्टी लेना आसान नहीं था…
लेकिन उसने कहा —
“मेरी बहन मेरा इंतजार कर रही है… मुझे जाना ही होगा…”
सफर लंबा था…
लेकिन उसके दिल में सिर्फ एक खुशी थी —
“इस बार मेरी कलाई खाली नहीं रहेगी…”
गाँव पहुँचते ही…
माँ की आँखों में आँसू आ गए…
“बेटा… तू आ गया…”
पिता चुप थे…
लेकिन उनकी आँखों में गर्व साफ दिख रहा था।
अमन ने चारों तरफ देखा…
“रानी कहाँ है…?”
माँ ने हल्का सा कहा —
“अंदर है…”
अमन कमरे में गया…
रानी फोन में लगी थी…
“रानी… देख मैं आ गया…”
उसने मुस्कुराते हुए कहा।
रानी ने बस एक नजर देखा…
“हम्म…” और फिर फोन में लग गई।
अमन थोड़ा चौंक गया…
“क्या हुआ…?”
“कुछ नहीं…” उसने ठंडे अंदाज में कहा।
रक्षाबंधन का दिन आया…
अमन सुबह से तैयार बैठा था…
लेकिन रानी…
अब भी दूर-दूर थी।
“राखी नहीं बाँधेगी…?” अमन ने धीरे से पूछा।
रानी ने गुस्से में कहा —
“आपको अब याद आई बहन…?”
“6 साल कहाँ थे…?”
अमन चुप हो गया…
“मैं तुम्हारे लिए ही तो गया था…” उसकी आवाज टूट रही थी।
“मेरे लिए…?” रानी हँसी —
“या अपने लिए…?”
“आपको कभी मेरी याद आई…?”
“हर साल मैं अकेली राखी मनाती रही…”
अमन की आँखों में आँसू आ गए…
“मैं हर दिन तुम्हें याद करता था…”
“बस… मजबूरी थी…”
कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया…
रानी की आँखें भी भर आईं…
उसने धीरे से राखी उठाई…
और काँपते हाथों से बाँध दी।
“मुझे लगा… आप बदल गए…”
वो रोते हुए बोली।
अमन ने उसका हाथ पकड़ा —
“दूरी से रिश्ते कमजोर नहीं होते… बस गलतफहमी हो जाती है…”
उस दिन…
दोनों रोए…
लेकिन…
उस राखी ने…
उनके बीच की दूरी मिटा दी।
और अब सवाल ये है —
👉 क्या सच में दूरी रिश्तों को कमजोर करती है…?
👉 या फिर… हम ही एक-दूसरे को समझना छोड़ देते हैं…?