मर्द भी रोता है… बस दिखता नहीं
“जल्दी वापस आना…” पत्नी ने जाते-जाते कहा।
रमेश मुस्कुरा दिया — “तुम्हारे लिए ही तो जा रहा हूँ…”
बिहार के एक छोटे से गाँव से रमेश हर साल बाहर जाता था… कमाने के लिए…
घर, बच्चे, पत्नी — सबकी जिम्मेदारी उसके कंधों पर थी।
वो खुद के लिए कुछ नहीं चाहता था… बस चाहता था कि उसके घर में कभी कमी ना हो।
जाते वक्त उसने अपने बेटे के सिर पर हाथ फेरा — “पापा जल्दी आएंगे…”
बेटा मासूमियत से बोला — “मेरे लिए क्या लाओगे…?”
रमेश हँस पड़ा — “जो तुम बोलोगे…”
लेकिन… उसे नहीं पता था कि उसकी गैरहाजिरी में… उसका घर धीरे-धीरे बदल रहा है।
रात के सन्नाटे में… फोन की हल्की आवाज…
“वो अभी बाहर है… जल्दी आओ…” पत्नी धीरे से कह रही थी।
धीरे-धीरे… ये बात सिर्फ फोन तक नहीं रही…
गाँव की गलियों में फुसफुसाहट बढ़ने लगी।
“रमेश तो बाहर है… और इधर…”
लेकिन कोई खुलकर कुछ नहीं कहता था।
क्योंकि हर कोई जानता था —
सच बोलने की कीमत बहुत भारी होती है।
एक दिन… रमेश को किसी ने फोन किया —
“भाई… जल्दी आ जाओ… सब ठीक नहीं है…”
उस रात रमेश सो नहीं पाया…
दिल में डर था… लेकिन भरोसा भी था —
“मेरी पत्नी ऐसा नहीं कर सकती…”
और यही भरोसा… उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गया।
रमेश बिना बताए घर पहुँचा…
दरवाज़ा खुला… घर खाली था…
चूल्हा ठंडा… कमरा सूना…
और पड़ोसी की वो बात —
“भाई… वो स्टेशन की तरफ गई है…”
रमेश के पैरों तले जमीन खिसक गई।
वो भागते हुए स्टेशन पहुँचा…
और वहाँ…
जो उसने देखा…
वो किसी दुश्मन के साथ नहीं… बल्कि अपने ही भरोसे के साथ खड़ी थी।
“मैं उसके साथ जा रही हूँ…” उसने ठंडी आवाज में कहा।
रमेश चिल्लाया नहीं…
बस धीरे से बोला —
“एक बार मेरी तरफ देख लो… क्या सच में इतना ही आसान था सब छोड़ना…?”
लेकिन उसकी आँखों में… ना शर्म थी… ना पछतावा…
रमेश के हाथ से बैग गिर गया…
“मैंने क्या कमी रखी थी…?”
उसकी आवाज टूट गई…
लेकिन जवाब फिर भी नहीं मिला।
उस दिन… रमेश पहली बार रोया…
भीड़ के बीच… लेकिन फिर भी अकेला।
क्योंकि…
मर्द रोता है… लेकिन दिखाता नहीं।
रात को जब वो घर लौटा…
उसका बेटा दरवाजे पर बैठा था…
“पापा… मम्मी कहाँ है…?”
रमेश कुछ नहीं बोल पाया…
बस उसे गले लगा लिया…
और पहली बार… उसके आँसू बाहर आ गए।
लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं होती…
अगले दिन सुबह…
रमेश को एक फोन आया…
और जो उसने सुना…
उसने उसकी पूरी जिंदगी बदल दी…
👉 “तुम्हारी पत्नी… वापस आना चाहती है…”
अब सवाल ये है —
क्या रमेश उसे वापस अपनाएगा…?
या फिर…
उसका टूटा हुआ भरोसा… अब कभी जुड़ नहीं पाएगा…?