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माँ की चुप्पी - बेटे के तानाशाही के आगे

Ayesha 24 Mar, 2026 88 Views
विधवा माँ मजदूरी करती हुई

“अब बच्चों का क्या होगा…?” गाँव की औरतें धीरे-धीरे बातें कर रही थीं।

रामदेई दरवाजे के कोने में बैठी थी…

आँखों से आँसू गिर रहे थे… लेकिन आवाज बिल्कुल नहीं थी।

पति की अर्थी जाते ही… उसकी जिंदगी जैसे रुक गई थी।

चार छोटे-छोटे बेटे… और सर पर पूरा आकाश जितनी जिम्मेदारी।

उस रात… वो नहीं सोई।

बस अपने बच्चों को सोते हुए देखती रही…

और मन ही मन कसम खाई —

“मैं इन्हें किसी चीज की कमी नहीं होने दूँगी… चाहे मुझे खुद मिटना पड़े…”

अगले दिन से… रामदेई ने खुद को बदल लिया।

अब वो सिर्फ एक औरत नहीं थी…

वो माँ भी थी… और बाप भी।

सुबह अंधेरे में उठती…

खेतों में मजदूरी करने जाती…

दोपहर की जलती धूप… और शाम की थकान…

सब सह लेती थी।

लेकिन जैसे ही घर लौटती…

चेहरे पर मुस्कान आ जाती —

“बेटा… भूख लगी होगी ना…?”

माँ बच्चों को खाना खिलाती हुई खुद भूखी

चारों बेटे उसके आसपास बैठ जाते…

वो अपने हाथों से खाना खिलाती…

“माँ, तुम नहीं खाओगी…?” सबसे छोटे ने पूछा।

रामदेई मुस्कुरा दी —

“मैं खा चुकी हूँ…”

लेकिन सच ये था… उसने पूरे दिन कुछ नहीं खाया था।

रात को… जब बच्चे सो जाते…

वो चुपचाप पानी पीकर सो जाती।

कभी-कभी भूख से पेट दर्द करता…

लेकिन उसने कभी किसी को नहीं बताया।

साल गुजरते गए…

बच्चे बड़े होते गए…

रामदेई बूढ़ी होती गई।

लेकिन उसकी उम्मीद… आज भी जवान थी।

वो हर दिन सोचती —

“एक दिन मेरे बेटे बड़े आदमी बनेंगे… और मुझे गर्व से अपने साथ रखेंगे…”

“अब मेरे दुख खत्म होंगे…”

विधवा माँ अर्थी पर बेटे रोते हुए

लेकिन…

जिस दिन वो दिन आया…

सब कुछ बदल गया।

चारों बेटे अब अपने-अपने काम में लग गए थे…

घर बड़ा हो गया था…

लेकिन माँ के लिए जगह छोटी पड़ गई।

“माँ, तुम हर बात में क्यों बोलती हो…?” बड़े बेटे ने गुस्से में कहा।

“हमें भी अपनी जिंदगी जीने दो…” दूसरे ने ताना मारा।

तीसरे ने मुँह फेर लिया…

और चौथा… जिसे वो सबसे ज्यादा प्यार करती थी…

वो भी चुप रहा।

रामदेई ने सब सुना…

लेकिन कुछ नहीं कहा।

बस धीरे से बोली —

“ठीक है बेटा…”

उस दिन पहली बार…

उसकी आँखों में आँसू नहीं थे।

शायद… आँसू भी थक चुके थे।

रात को… वो आँगन में अकेली बैठी थी…

हाथ में पुरानी तस्वीर थी…

चारों बेटे छोटे थे… उसके आसपास हँस रहे थे।

रामदेई उस तस्वीर को देखती रही…

और हल्के से मुस्कुरा दी।

“कितने अच्छे थे मेरे बच्चे…” उसने धीरे से कहा।

उस रात… वो सोई…

लेकिन सुबह… वो उठी नहीं।

चारों बेटे उसके पास खड़े थे…

लेकिन अब… कुछ भी कहने के लिए देर हो चुकी थी।

कोने में वही पुरानी तस्वीर पड़ी थी…

और पास में… माँ का एक कागज…

जिसमें लिखा था —

“मैंने कभी तुमसे कुछ नहीं माँगा… बस तुम्हारी खुशी चाही…”

“अगर कभी मेरी याद आए… तो एक बार वैसे ही बुला लेना — जैसे बचपन में बुलाते थे…”

“माँ…”

उस दिन… चारों बेटे रोए…

जोर से… इतना जोर से कि पूरा आँगन गूंज उठा…

लेकिन…

अब सुनने वाला कोई नहीं था।

जिस माँ ने उनकी हर छोटी आवाज पर दौड़कर उन्हें सीने से लगा लिया था…

आज वही माँ… चुप थी… हमेशा के लिए।

घर में सब कुछ था…

पैसा था… सुविधाएँ थीं… बड़ा घर था…

बस…

एक माँ नहीं थी।

और सच तो ये है —

जिस घर में माँ नहीं होती… वो घर नहीं… सिर्फ दीवारें रह जाती हैं।

उस दिन चारों बेटों को समझ आया —

जिसे वो बोझ समझ रहे थे…

वही उनकी सबसे बड़ी दौलत थी।

जिसे वो हर दिन टाल देते थे…

वही उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी नहीं… बल्कि सबसे बड़ा सहारा थी।

लेकिन…

अब पछताने से क्या फायदा…?

माँ ने कभी हिसाब नहीं माँगा…

लेकिन जिंदगी ने… एक ही दिन में पूरा हिसाब ले लिया।

क्योंकि…

माँ का दिल बहुत बड़ा होता है…

वो हर दर्द सह लेती है… हर जख्म छुपा लेती है…

लेकिन जब वो जाती है ना…

तो अपने साथ… पूरी दुनिया ले जाती है।

और पीछे छोड़ जाती है —

बस…

एक खाली घर…

और जिंदगी भर का पछतावा।

लेखक: Ayesha
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