खोया हुआ रास्ता
एक छोटे से गाँव चाँदपुर में एक लड़का रहता था, उसका नाम अर्जुन था। अर्जुन बहुत शांत स्वभाव का था। गाँव के बाकी लड़कों की तरह वह शरारती नहीं था। उसे अकेले बैठकर नदी के किनारे सूरज को डूबते हुए देखना बहुत अच्छा लगता था।
अर्जुन के पिता किसान थे और माँ घर संभालती थीं। उनका परिवार अमीर नहीं था, लेकिन खुश जरूर था। अर्जुन का सपना था कि वह पढ़-लिखकर शहर में बड़ा आदमी बने और अपने माता-पिता को अच्छी जिंदगी दे।
लेकिन जिंदगी हमेशा सीधी राह नहीं दिखाती। एक दिन अर्जुन के पिता बीमार पड़ गए। खेती का सारा काम अर्जुन पर आ गया। पढ़ाई और खेत – दोनों संभालना उसके लिए बहुत मुश्किल हो गया। कई बार वह रात को खेत से लौटकर थक कर वहीं सो जाता था।
गाँव के लोग कहते थे – “अर्जुन, पढ़ाई छोड़ दे, खेती ही कर।” लेकिन अर्जुन के दिल में एक आग थी। वह जानता था कि अगर उसने हार मान ली तो उसका सपना हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
एक दिन वह नदी किनारे बैठा था। आसमान लाल हो रहा था और पानी में सूरज की परछाई चमक रही थी। तभी एक बूढ़े बाबा वहाँ आए।
बाबा ने पूछा – “बेटा, इतना उदास क्यों बैठा है?” अर्जुन ने अपनी सारी परेशानी बता दी।
बाबा मुस्कुराए और बोले – “जिंदगी नदी की तरह होती है। रास्ते में पत्थर आएंगे, मोड़ आएंगे, लेकिन नदी कभी रुकती नहीं। अगर तू भी नहीं रुकेगा तो मंज़िल जरूर मिलेगी।”
उस दिन के बाद अर्जुन ने ठान लिया कि चाहे कितनी भी मुश्किल आए, वह पढ़ाई नहीं छोड़ेगा। वह दिन में खेत में काम करता और रात में लालटेन की रोशनी में पढ़ता।
साल बीत गए। एक दिन गाँव में खबर आई कि अर्जुन ने सरकारी परीक्षा पास कर ली और अब वह शहर में अधिकारी बन गया है।
जब अर्जुन कई साल बाद गाँव लौटा, तो वही रास्ता, वही नदी, वही बरगद का पेड़ उसे देखकर जैसे मुस्कुरा रहे थे।
अर्जुन ने अपने पिता की जमीन सुधारी, गाँव में एक स्कूल बनवाया, और बच्चों से कहा –
“सपना देखो… और उसे पूरा करने की हिम्मत भी रखो।”