40 की उम्र में बनी माँ - एक औरत की दास्तान
“अभी तक कोई खुशखबरी नहीं…?” नंद ने ताना मारा।
जेठानी हँसते हुए बोली — “कुछ लोगों के नसीब में ही नहीं होता…”
वो चुप थी…
उसका नाम सायरा था…
शादी को 5 साल हो चुके थे…
लेकिन उसकी गोद आज भी खाली थी।
गाँव वाले… रिश्तेदार… घर के लोग…
हर कोई उसे एक ही नाम से बुलाने लगा था —
“बाँझ…”
हर शब्द उसके दिल को चीर देता…
लेकिन वो कुछ नहीं कहती।
क्योंकि… उसके पास सिर्फ एक सहारा था —
उसका पति।
“लोग क्या कहते हैं, मुझे फर्क नहीं पड़ता…” उसका पति हमेशा कहता।
“तुम मेरे लिए काफी हो…”
सायरा ने उम्मीद नहीं छोड़ी…
वो हर जगह गई…
मंदिर… मस्जिद… दरगाह…
हर जगह सिर झुकाया…
“या अल्लाह… एक औलाद दे दे…”
“भगवान… मेरी गोद भर दे…”
उसकी आँखों में सिर्फ एक ही सपना था —
“माँ” कहलाने का।
साल गुजरते गए…
उम्र बढ़ती गई…
और लोगों के ताने भी।
धीरे-धीरे… अब उसके पति पर भी सवाल उठने लगे —
“क्यों निभा रहे हो ऐसे रिश्ते को…?”
“दूसरी शादी कर लो…”
सायरा ये सब सुनती…
और अंदर ही अंदर टूटती जाती।
एक दिन… उसने आईने में खुद को देखा…
और पहली बार…
खुद से पूछा —
“क्या सच में मुझमें ही कमी है…?”
फिर…
किस्मत ने करवट ली।
40 साल की उम्र में…
सायरा माँ बनी।
घर में खुशियाँ आईं…
लेकिन…
कुछ अधूरा था।
उसका बच्चा…
सामान्य नहीं था।
लोग फिर से बोलने लगे —
“देखा… इतनी देर से यही होना था…”
“भगवान ने भी आधा दिया…”
सायरा ने सब सुना…
लेकिन इस बार…
वो चुप नहीं थी।
उसने अपने बच्चे को सीने से लगाया…
और मुस्कुराते हुए कहा —
“ये अधूरा नहीं है… ये मेरा पूरा संसार है…”
आँखों में आँसू थे…
लेकिन इस बार…
वो दर्द के नहीं…
ममता के थे।
क्योंकि…
जिस औरत को दुनिया ने सालों तक “बाँझ” कहा…
आज वही औरत…
“माँ” बन चुकी थी।
और उसके लिए…
यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी।